रविवार, 12 जुलाई 2015

 रमज़ान जारिया हैगा

उर्दू का हर कलन्डर, हमको बतारिया हैगा
रमज़ान जारिया हैगा, रमज़ान जारिया हैगा

ईदी मिलेगी तगड़ी, कपड़े बनंगे नै-नै
बच्चों का दिल हलक़ से, बाहरकू आरिया हैगा

जिसने रखे ना रोज़े, और ना पढ़ी तरावीह
वो भी फुदक-फुदक के, ख़ुशियां मनारिया हैगा

कुर्ता तो सिल गिया है, पर ना सिला पजामा
दर्ज़ी भी आज देखो, नख़रे दिखारिया हैगा

अफ़्तार जम के ठूंसा, सहरी दबाके पेली
अब दस किलो सिवईंयें, हर पेटू लारिया हैगा

देदे ज़कात बन्दे, नादार मुस्तहिक़ को
मिस्कीन-बे-कसों का, हक़ क्यूं दबारिया हैगा

तैयारी ईद की अब, तू भी तो कर ले ’शम्सी’
अशआर बेतुके ये, काएकू सुनारिया हैगा

---मुईन शम्सी

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

अब्र-ए-रहमत (Abr-e-rahmat) ('गर्भनाल' पत्रिका के अक्तूबर २०१२ अंक में प्रकाशित)


अब्र-ए-रहमत तू झूम-झूम के आ 
आसमानों को चूम-चूम के आ 


कब से सूखी पड़ी है यह धरती 
प्यास अब तो तू इसकी आ के बुझा 


खेत-खलिहान तर-ब-तर होंगे 
अपनी बूंदें अगर तू देगा गिरा


बूंद बन जाएगी खरा मोती 
सीप मुंह अपना गर रखेगी खुला 


फ़स्ल ’शमसी’ की लहलहाएगी 
फिर न शिकवा कोई, न कोई गिला । 

---मुईन शमसी 

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 Abr-e-rahmat tu jhoom-jhoom ke aa 
aasmaano ko choom-choom ke aa 


kab se sookhi padi hai ye dharti 
pyaas ab to tu iski aa ke bujha 


khet-khalihaan tar-ba-tar honge 
apni boondeN agar tu dega gira 


boond ban jaaegi khara moti 
seep munh apna gar rakhegi khula 


fasl 'shamsi' ki lehlahaaegi 
phir na shikwa koi, na koi gila. 

---Moin Shamsi


रविवार, 7 अक्तूबर 2012

"गर्भनाल" पत्रिका के अक्टूबर २०१२ अंक में प्रकाशित ग़ज़ल : लम्स



याद मुझे अक्सर आता है लम्स तुम्हारे होटों का 
ख़्वाब में आकर तड़पाता है लम्स तुम्हारे होटों का 

यादें धुंधला चुकी हैं यों तो साथ गुज़ारे लम्हों की
साफ़ है रोज़-ए-रौशन सा वो लम्स तुम्हारे होटों का 

कोशिश सदहा की पर लम्हे भर को भी ना भूल सके
दिल पे यों हो गया है चस्पां लम्स तुम्हारे होटों का 

जाम तुम्हारी नज़रों से दिन-रात पिया करते थे हम
लेकिन बस इक बार मिला वो लम्स तुम्हारे होटों का 

जुदा हुए थे जब तुम हसरत तब से ये है ’शमसी’ की
काश दुबारा मिल जाए वो लम्स तुम्हारे होटों का
---मुईन शमसी

शब्दार्थ :
लम्स = स्पर्श
होटों = होठों
रोज़-ए-रौशन = उजाले से भरा दिन
सदहा = सौ बार
चस्पां = चिपक जाना
हसरत = अभिलाषा

सोमवार, 20 अगस्त 2012

My ghazal published in "SAHAAFAT" daily on 25.3.2012


उनसे मिलकर ये बात पूछूंगा                    Unse milkar ye baat poochhoonga
 कैसे पाऊं निशात पूछूंगा                        Kaise paaun nishaat poochhoonga


मेरी बीनाई तो सलामत है                           Meri beenaai to salaamat hai
दिन क्यों लगता है रात पूछूंगा                  Din kyu lagta hai raat poochhoonga


ईद तो कब की हो चुकी मेरी                           Eid to kab ki ho chuki meri 
कब है शब्बे-बरात पूछूंगा                    Kab hai shabbe-baraat poochhoonga 


मैं हूं नज़रों के जाम पर ज़िंदा                   Main hu nazron ke jaam par zinda
 क्या है आबे-हयात पूछूंगा                     Kya hai aabe-hayaat poochhoonga 


जब से बिछड़ा हूं उन से सूनी सी                 jab se bichhda hu unse sooni si
 क्यों लगे कायनात पूछूंगा                       Kyu lage kaaynaat poochhoonga 


हुस्न के अपने इस ख़ज़ाने की                       Husn ke apne is khazaane ki
 क्यों न देते ज़कात पूछूंगा                      Kyu na dete zakaat poochhoonga 


बाज़ी-ए-आशिक़ी में ’शमसी’ को                    Baazi-e-ashiqi me 'shamsi' ko 
क्यों हुई है ये मात पूछूंगा ।                    kyu hui hai ye maat poochhoonga. 


---मुईन शमसी                                                         ---Moin Shamsi 

शनिवार, 3 मार्च 2012

स्कूटरिस्ट से बाइकर (published in SUNDAY NAI DUNIA (4-10 March 2012)


’फ़ाइट-ए-ट्रैफ़िक’ के हम परफ़ैक्ट फ़ाइटर हो गए 
पहले थे ’इस्कूटरिस्ट’, अब हम भी ’बाइकर’ हो गए 


दस बरस तक हमने ’इस्कूटर’ पे जम के सैर की
 इक दफ़ा टक्कर भी खाई, रब ने लेकिन ख़ैर की 
गिर रहे थे जब, लगा यूं ’हम तो ग्लाइडर हो गए’ 
पहले थे ’इस्कूटरिस्ट’, अब हम भी ’बाइकर’ हो गए 


"है छिछोरों का ये वाहन" कहते हम बाइक को थे
 "हम-से सज्जन तो ’सकूटर’ पे ही लगते हैं भले"
 किन्तु बदली सोच, पैशन-प्रो के रायडर हो गए 
पहले थे ’इस्कूटरिस्ट’, अब हम भी ’बाइकर’ हो गए 


दोस्त कहते थे "मियां, तुम हो बड़े ही बैकवर्ड
 ले लो बाइक, छोड़ो ’इस्कूटर’, बनो कुछ फ़ॉरवर्ड"
 बात उनकी मान ली, ’वाइज़’ से ’वाइज़र’ हो गए 
पहले थे ’इस्कूटरिस्ट’, अब हम भी ’बाइकर’ हो गए 


बनके भीगी बिल्ली पहले रोड पे चलते थे हम
 जब झुका कर मारते किक, तो बड़ी आती शरम
 शान से अब दनदनाते हैं कि टाइगर हो गए 
पहले थे ’इस्कूटरिस्ट’, अब हम भी ’बाइकर’ हो गए 


है तुम्हारे पास ’इस्कूटर’ अभी तक, तो सुनो 
बेच दो, वो है खटारा,कोई भी बाइक चुनो
 ख़र्च कर लो नोट कुछ, क्यों इतने माइज़र हो गए
 पहले थे ’इस्कूटरिस्ट’, अब हम भी ’बाइकर’ हो गए
 ---मुईन शमसी 

सोमवार, 30 जनवरी 2012

ग़ज़ल : होना चाहिये (Ghazal : Hona Chahiye)(published in urdu daily INQUILAAB in January 2012)


तीर नज़रों का जिगर के पार होना चाहिये
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिये

यह दिलों का मैल तो इक लम्हे में हट जाएगा
सद्क़ दिल से बस कोई गुफ़्तार होना चाहिये

तैर तो लूंगा ही मैं और पार भी हो जाऊंगा
हां मगर दरिया में इक मंझधार होना चाहिये

आज खेला है जो अस्मत से किसी मासूम की
वो भरे बाज़ार में संगसार होना चाहिये

जो तुम्हारे दोस्त हैं, मुख़लिस हैं और हमदर्द हैं
उन सभी का तुम को भी ग़मख़्वार होना चाहिये

जिंस, मज़हब, ज़ात, फ़िरक़ा, क़ौम से ऊपर उठो
तुम को बस इंसानियत से प्यार होना चाहिये

इन झुकी नज़रों ने ’शमसी’ बात जो तस्लीम की
उसका अब होंटों से भी इक़रार होना चाहिये ।

---मुईन शमसी

Teer nazron ka jigar ke paar hona chahiye
ishq hai to ishq ka izhar hona chahiye

ye dilon ka mail to ik lamhe me hat jaayega
sadq dil se bas koi guftaar hona chahiye

tair to loonga hi main aur paar bhi ho jaaunga
haan magar dariya me ik manjhdhar hona chahiye

aaj khela hai jo asmat se kisi maasoom ki
wo bharey baazaar me sangsaar hona chahiye

jo tumhare dost hain, mukhlis hain aur hamdard hain
un sabhi ka tum ko bhi ghamkhwar hona chahiye

jins, mazhab, zaat, firqa, qaum se oopar utho
tum ko bas insaniyat se pyar hona chahiye

in jhuki nazron ne 'shamsi' baat jo tasleem ki
uska ab honton se bhi iqrar hona chahiye.

---Moin Shamsi

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

सबसे बड़ा अक़्लमंद (All Rights Are Reserved)


इक दफ़ा की बात है इक बादशाह ने सोचा ये 
है अक़लमंद कौन सबसे ज़्यादा मेरे मुल्क में 

पहले उसने आज़माए अपने दरबारी सभी 
ना मगर उसको तसल्ली इस ज़रा-सी भी हुई 

कर लिया उसने तलब अपने वज़ीर-ए-ख़ास को 
"जो अक़लमंद सबसे हो, उस शख़्स को हाज़िर करो 

कल तलक गर शख़्स ऐसा इक भी तुम ना ला सके 
डाल देंगे क़ैदख़ाने के अंधेरों में तुम्हें" 

हिल गया सुन कर वज़ीर इस बे-रहम फ़रमान को 
’क्यूं ना पिटवाऊं ढिंढोरा और बचाऊं जान को’ 

हो गया ऐलान हर-सू तीन आए नौजवां 
"मैं अक़लमंद सबसे ज़्यादा" तीनों ने दावा किया 

सुनके उनकी बात उलझन में वज़ीर-ए-ख़ास था 
’कौन है तीनों में आख़िर, अक़्लमंद सबसे बड़ा  

किसको मैं सुलतान के दरबार में हाज़िर करूं 
उफ़ ख़ुदा ! किस पे ये उलझन अपनी मैं ज़ाहिर करूं ?’ 

थी वज़ीर-ए-ख़ास की इक बेटी सत्रह साल की 
अक़्लमंदी और समझदारी से मालामाल थी 

देख वालिद को परीशां, उसने पूछा, "बात क्या ?" 
कह सुनाया बाप ने बेटी को जो था माजरा 

सुन के सारी बात बेटी सोच में कुछ पड़ गई 
फिर यकायक कह उठी, "तरकीब मुझको मिल गई" 

कह के ये फिर कह सुनाई उसने जो तरकीब थी 
बाप के चेहरे पे रक़्सां हो गई फिर इक ख़ुशी 

अगले दिन बोला वज़ीर उन नौजवानों से, "सुनो ! 
इम्तिहां देना पड़ेगा अक़्ल का तुम तीनों को 

बंद इक कमरे में हम तुम तीनों को करते हैं आज 
और रहेगा कमरे के दरवाज़े पे ताले का राज 

जो बिना दरवाज़ा तोड़े, बाहर आ के दे दिखा 
उसको ही मानेंगे अब हम अक़्लमंद सबसे बड़ा" 

हो गए कमरे में बंद वो सोचते बस ये रहे 
’कैसे बाहर आ कर ख़ुद को अक़्लमंद साबित करें’ 

पहले ने सोचा बहुत, लेकिन न सूझा कुछ उसे 
दूसरे की भी समझ में कुछ न आया क्या करे 

दोनों काफ़ी देर तक बस सोचते बैठे रहे 
’है नहीं मुमकिन निकलना’ ख़ुद से ही कहते रहे 

तीसरे को सूझा कुछ, झट-से खड़ा वो हो गया 
जा के दरवाज़े को उसने ज़ोर का धक्का दिया 

खुल गया दरवाज़ा, दोनों शख़्स ही हैरान थे 
तीसरे की अक़्लमंदी से बड़े परेशान थे 

मिल गया उलझन का अपनी हल वज़ीर-ए-ख़ास को 
चल पड़ा ले कर जवां को बादशाह के पास वो 

जा के उसने कह सुनाया बादशाह को माजरा 
सुन के सारी बात बेहद ख़ुश हुए आलम-पनाह 

हीरों का इक हार था उनके गले में जो पड़ा 
हो के ख़ुश अपने वज़ीर-ए-ख़ास को वो दे दिया 

उस अक़लमंद शख़्स से सुल्तान ने फिर यह कहा 
"आज इस दरबार में हमने तुम्हें दे दी जगह" 

शाह के दरबार में ओहदा जवां को मिल गया 
अक़्ल का इनआम पा के चेहरा उसका खिल गया 

सच कहा है ये किसी ने "आए जब मुश्किल कोई 
अक़्ल से तुम काम ले लो, जाग उठे क़िस्मत सोई ।"