सोमवार, 26 दिसंबर 2011

सबसे बड़ा अक़्लमंद (All Rights Are Reserved)


इक दफ़ा की बात है इक बादशाह ने सोचा ये 
है अक़लमंद कौन सबसे ज़्यादा मेरे मुल्क में 

पहले उसने आज़माए अपने दरबारी सभी 
ना मगर उसको तसल्ली इस ज़रा-सी भी हुई 

कर लिया उसने तलब अपने वज़ीर-ए-ख़ास को 
"जो अक़लमंद सबसे हो, उस शख़्स को हाज़िर करो 

कल तलक गर शख़्स ऐसा इक भी तुम ना ला सके 
डाल देंगे क़ैदख़ाने के अंधेरों में तुम्हें" 

हिल गया सुन कर वज़ीर इस बे-रहम फ़रमान को 
’क्यूं ना पिटवाऊं ढिंढोरा और बचाऊं जान को’ 

हो गया ऐलान हर-सू तीन आए नौजवां 
"मैं अक़लमंद सबसे ज़्यादा" तीनों ने दावा किया 

सुनके उनकी बात उलझन में वज़ीर-ए-ख़ास था 
’कौन है तीनों में आख़िर, अक़्लमंद सबसे बड़ा  

किसको मैं सुलतान के दरबार में हाज़िर करूं 
उफ़ ख़ुदा ! किस पे ये उलझन अपनी मैं ज़ाहिर करूं ?’ 

थी वज़ीर-ए-ख़ास की इक बेटी सत्रह साल की 
अक़्लमंदी और समझदारी से मालामाल थी 

देख वालिद को परीशां, उसने पूछा, "बात क्या ?" 
कह सुनाया बाप ने बेटी को जो था माजरा 

सुन के सारी बात बेटी सोच में कुछ पड़ गई 
फिर यकायक कह उठी, "तरकीब मुझको मिल गई" 

कह के ये फिर कह सुनाई उसने जो तरकीब थी 
बाप के चेहरे पे रक़्सां हो गई फिर इक ख़ुशी 

अगले दिन बोला वज़ीर उन नौजवानों से, "सुनो ! 
इम्तिहां देना पड़ेगा अक़्ल का तुम तीनों को 

बंद इक कमरे में हम तुम तीनों को करते हैं आज 
और रहेगा कमरे के दरवाज़े पे ताले का राज 

जो बिना दरवाज़ा तोड़े, बाहर आ के दे दिखा 
उसको ही मानेंगे अब हम अक़्लमंद सबसे बड़ा" 

हो गए कमरे में बंद वो सोचते बस ये रहे 
’कैसे बाहर आ कर ख़ुद को अक़्लमंद साबित करें’ 

पहले ने सोचा बहुत, लेकिन न सूझा कुछ उसे 
दूसरे की भी समझ में कुछ न आया क्या करे 

दोनों काफ़ी देर तक बस सोचते बैठे रहे 
’है नहीं मुमकिन निकलना’ ख़ुद से ही कहते रहे 

तीसरे को सूझा कुछ, झट-से खड़ा वो हो गया 
जा के दरवाज़े को उसने ज़ोर का धक्का दिया 

खुल गया दरवाज़ा, दोनों शख़्स ही हैरान थे 
तीसरे की अक़्लमंदी से बड़े परेशान थे 

मिल गया उलझन का अपनी हल वज़ीर-ए-ख़ास को 
चल पड़ा ले कर जवां को बादशाह के पास वो 

जा के उसने कह सुनाया बादशाह को माजरा 
सुन के सारी बात बेहद ख़ुश हुए आलम-पनाह 

हीरों का इक हार था उनके गले में जो पड़ा 
हो के ख़ुश अपने वज़ीर-ए-ख़ास को वो दे दिया 

उस अक़लमंद शख़्स से सुल्तान ने फिर यह कहा 
"आज इस दरबार में हमने तुम्हें दे दी जगह" 

शाह के दरबार में ओहदा जवां को मिल गया 
अक़्ल का इनआम पा के चेहरा उसका खिल गया 

सच कहा है ये किसी ने "आए जब मुश्किल कोई 
अक़्ल से तुम काम ले लो, जाग उठे क़िस्मत सोई ।"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें