बुधवार, 1 जून 2011

ग़ज़ल : अफ़सोस...! (सर्वाधिकार सुरक्षित) GHAZAL : AFSOS...! (ALL RIGHTS ARE RESERVED.)

इक हंसते-खेलते गुलशन को वीराना कराया है
ज़रा-सी ज़िद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है

सियासत नाम है इसका, ज़रा मालूम तो कर लो
कि गुज़रे वक़्त में इसने तमाशा क्या कराया है

ख़ुदा ग़ारत करे उसको कि माल-ओ-ज़र के लालच में
सगे भाई का जिसने भाई से झगड़ा कराया है

बड़ा कम्बख़्त है, लोगो, न उसकी चाल में आना
लड़ाएगा वही फिर, जिसने समझौता कराया है

क़सीदे लाख जो पढ़ता है अपने पाक दामन के
उसी मरदूद ने इस शहर में दंगा कराया है

उसे मैं कोसता हूं पर उसी से प्यार करता हूं
न जाने उसने मुझ पे सहर ये कैसा कराया है

बज़ाहिर तो बनाई है इबादतगाह ’शमसी’ ने
हुकूमत की ज़मीं पर अस्ल में क़ब्ज़ा कराया है
---मुईन शमसी

( इस ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुनने के लिये नीचे दिये गए लिंक को कॉपी-पेस्ट करें :
http://www.esnips.com/doc/115ff438-33be-459f-9f1b-dcf7e3f9dec2/MY-NEW-GHAZAL-afsos...! )



ik hanste khelte gulshan ko veerana karaaya hai
zaraa-si zid ne is aangan ka bantwara karaya hai

siyasat naam hai iska, zara maaloom to kar lo
ki guzre waqt me isne tamasha kya karaya hai

khuda ghaarat kare usko, ki maal-o-zar ke lalach me
sagey bhaai ka jisne bhaai se jhagda karaya hai

bada kambakht hai, logo, na uski chaal me aana
ladaayega wahi phir, jisne samjhauta karaya hai

qaseede laakh jo padhta hai apne paak daaman ke
usee mardood ne is shahar me danga karaya hai

usey main kosta hu, par, usee se pyar karta hu
na jaane usne mujh pe sahar ye kaisa karaya hai

bazaahir to banaai hai ibaadat-gaah 'shamsi' ne
hukoomat ki zamee par asl me qabza karaya hai
---Moin Shamsi

(To listen this ghazal in my voice, copy-paste this link:
http://www.esnips.com/doc/115ff438-33be-459f-9f1b-dcf7e3f9dec2/MY-NEW-GHAZAL-afsos...! )

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