रविवार, 20 मार्च 2011

होली-ग़ज़ल

प्रेम के रंग में सब रंग जाएं, दिन है ठेल-ठिठोली का
मिटें नफ़रतें बढ़े मुहब्बत, तभी मज़ा है होली का ।

एक न इक दिन भर जाते हैं, घाव बदन पर जो लगते
ज़ख़्म नहीं भरता है लेकिन, कभी भी कड़वी बोली का ।

ज़ात-धरम-सिन-जिंस न देखे, बदन में जा कर धंस जाए
कोई अपना सगा नहीं होता, बंदूक़ की गोली का ।

कभी महल में रहता था वो, क़िस्मत ने करवट बदली
नहीं किराया दे पाता है, अब छोटी-सी खोली का ।

दूर से तुम अहवाल पूछ कर, रस्म अदा क्यों करते हो
पास में बैठो फिर समझोगे, दर्द किसी हमजोली का ।

गोद में जिसकी खेलीं दो-दो पुश्तें, देखो तो लोगो
चीर-हरण कर डाला उसने, इक मासूम-सी भोली का ।

’शमसी’, कोई लाख जतन कर ले, पर दाढ़ी-टोपी से
प्यार मुसलसल बना रहेगा, चावल-चंदन-रोली का ।

---मुईन शमसी


शब्दार्थ:
सिन : उम्र
जिंस : लिंग (gender)
खोली : छोटा-सा कमरा
अहवाल : हालचाल
पुश्तें : पीढ़ियां
मुसलसल : लगातार

1 टिप्पणी:

  1. एक न इक दिन भर जाते हैं, घाव बदन पर जो लगते
    ज़ख़्म नहीं भरता है लेकिन, कभी भी कड़वी बोली का .....naye labo-lahze ki umda ghazal.....mubaraq ho.

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