शनिवार, 10 सितंबर 2011

दो किलो चावल (मुल्ला नसरुद्दीन की एक कहानी) (सर्वाधिकार सुरक्षित)


अच्छा बच्चो, आज मुझको तुम ये बतलाओ ज़रा 
नाम तुमने मुल्ला नसरुद्दीन का तो है सुना ? 


एक दिन मुल्ला ने सोचा, ’आज बिरयानी पके’ 
बोली बीवी, "जा के चावल लाओ तुम बाज़ार से" 


ले के थैला, लाने चावल, मुल्ला साहब चल दिये 
दो किलो चावल ख़रीदे, घर को वापस हो लिये 


रास्ते में याद आया, ’दोस्त इक बीमार है 
जा के उसका हाल पूछूं, कैसा मेरा यार है 


ले के थैला जाना लेकिन, ना-मुनासिब बात है 
लेकिन आख़िर क्या करूं इस थैले का, जो साथ है?’ 


सोच में डूबे थे मुल्ला, के अचानक आया याद 
’एक और पहचान वाला रहता है यां आसपास 


क्यूं न थोड़ी देर को ये थैला उसके घर रखूं 
दोस्त की तबियत मैं पूछूं, इस को फिर आकर मैं लूं’ 


सोच कर ये, मुल्ला साहब हाथ में थैला लिये 
नाम था ’मतलूब’ जिसका, उसके घर को चल दिये 


जब वो पहुंचे उस के घर, देखा कि इक बत्तख़ भी थी 
खाना उसको देने में मसरूफ़ थे मतलूब जी 


बोले मुल्ला, "ऐ मियां, इक महरबानी कीजिये 
ये मेरा चावल का थैला. देर कुछ रख लीजिये" 


"ठीक है" मतलूब ने कह कर, वो थैला रख लिया 
लेकिन अब वो क्या करेगा, था न मुल्ला को पता 


दोस्त से मिल कर जब आए मुल्ला साहब बाद में 
दे दिया मतलूब ने बस ख़ाली थैला हाथ में 


हो के हैरां, बोले मुल्ला "चावल इसके क्या हुए ?" 
बोला ये मतलूब "इस बत्तख़ ने सब वो खा लिये" 


सुन के ग़ुस्सा आ गया मुल्ला को उस बे-ईमान पे 
’किस क़दर धोका किया मुझ-से शरीफ़ इंसान से 


लेकिन इसको इस क़दर आसानी से बख़्शूं न मैं 
ले के चावल मैं रहूंगा, जो छिपाए घर में हैं’ 


सोच कर ये, मुल्ला साहब ने उठाई वो बतख़ 
जिसको पाला था मियां मतलूब ने माहों तलक 


डाल कर थैले में बत्तख़, मुल्ला जी जाने लगे 
देख ये, मतलूब साहब तैश में आने लगे 


चाल अपनी चलती देखी, मुल्ला जी ख़ुश हो गए 
रोक कर अपनी हंसी, मतलूब से कहने लगे 


"तैश में आते हो क्यूं ? बत्तख़ को घर ले जाता हूं 
पेट इसका काट के कुछ देर में ले आता हूं 


अपने चावल ले के वापस, पेट इसका दूंगा सिल 
मुझ को मेरे चावल, और बत्तख़ तुम्हें जाएगी मिल" 


देख कर हुशियारी मुल्ला की, हुआ मतलूब चुप 
क्या करे क्या ना करे, उसको न सूझा और कुछ 


बोला मुल्ला से "मियां, तुम एक लम्हे को रुको 
तुम को चावल मैं अभी देता हूं, बस इतना करो 


मेरी बत्तख़ ले न जाओ, मैंने की थी दिल्लगी 
एक बत्तख़ दो किलो चावल तो खा सकती नहीं" 


कह के ये मतलूब ने, चावल उन्हें लौटा दिये 
ले के थैला चावलों का, मुल्ला ख़ुश-ख़ुश चल दिये 

सच कहा है ये किसी ने "मुश्किलों के वक़्त तुम 
अक़्ल से सोचो, न होने दो हवास-ओ-होश गुम 

देखना फिर, मुश्किलें आसान सब हो जाएंगी 
फिर सताने तुम को, काफ़ी दिन तलक न आएंगी" 
---मुईन शमसी

बुधवार, 7 सितंबर 2011

इल्म हासिल करो (All rights are reserved)


( The audio of this song is available at :   http://www.box.net/shared/2uzuf8c2utxb226jm9lb ) 

इल्म हासिल करो, इल्म हासिल करो,
 ए मेरे दोस्तो, इल्म हासिल करो.


जिन्हों ने समझी तालीम की अहमियत,
लिखने-पढ़ने से जिनको हुई उनसियत,
आगे वो बढ़ गये, पीछे तुम रह गये,
ख़ुद को तुम और ख़ुदारा ना ग़ाफिल करो,
इल्म हासिल करो...


चल रही है तरक़्क़ी की देखो हवा,
जो भी लिख-पढ़ गया वो ही क़ाबिल बना,
बाद पछताओगे गर यूँ सोते रहे,
नींद से जागो ख़ुद को ना काहिल करो,
इल्म हासिल करो...


एक दिन आएगा तुम बनोगे बड़े,
आलिमो की सफ़ो मे रहोगे खड़े,
ख़्वाब "शम्सी" का ये क्यों ना सच हो रहे,
खुद को जानिब किताबो के माइल करो,
इल्म हासिल करो...


इल्म हासिल करो,  इल्म हासिल करो,
ए मेरे दोस्तो,  इल्म हासिल करो.
 ---Moin Shamsi 

( MEANINGS:
ILM: GYAAN
TAALEEM: SHIKSHA
UNSIYAT: LAGAAV
KHUDAARA: ESSHWAR KE LIYE (FOR GOD SAKE)
GHAAFIL: ANJAAN
GAR: AGAR
KAAHIL: SUST
AALIM: VIDWAAN
SAF: PANKTI
 MAAIL: AAKARSHIT )

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

सिंड्रैला की कहानी (सर्वाधिकार सुरक्षित)


इक रियासत में कभी रहती थी इक लड़की हसीं,,
 थी बला की ख़ूबसूरत, ऐब उसमें इक नहीं 

नाम उसका सिंड्रैला, वो बड़ी ही नेक थी,,
 हुस्न के क्या कहने उसके, लाखों में वो एक थी 

घर में उसकी मां भी थी और उसकी कुछ बहनें भी थीं,,
 हां मगर इक बात थी, वो सब की सब सौतेली थीं 

सिंड्रैला को सतातीं, उस पे करतीं ज़ुल्म थीं,,
 काम घर के सब करातीं, ख़ुद वो कुछ करतीं नहीं 

थी परेशां सिंड्रैला, ’उफ़’ मगर करती न थी,,
 करती भी क्या आख़िर, उसका अपना था कोई नहीं 

उस रियासत के शहंशाह ने किया ऐलान ये,,
 "शादी शहज़ादे की होगी, हर कोई ये जान ले

ख़ूबसूरत लड़कियां इस मुल्क में हों जितनी भी,,
 इक मुक़र्रर वक़्त पर दरबार में आएं सभी 

अपनी दुल्हन ख़ुद चुनेगा शाहज़ादा फिर वहां,,
 जो पसंद आएगी उसको, उससे ही होगा निकाह" 

सुन के ये ऐलान, सारी लड़कियां सजने लगीं,,
 थाम के दिल, इन्तिज़ार उस लम्हे का करने लगीं

सिंड्रैला की जो बहनें थीं, लगीं ये सोचने,,
 "ये अगर दरबार में जा पहुंची तो फिर होगा ये  

देख कर शहज़ादा इसको, देखता रह जाएगा,,
 कौन पूछेगा हमें, इसको ही वो अपनाएगा" 

सोच कर ये बात, घर के काम सब उसको दिये,,
 चल पड़ीं दरबार को, परवाह बिन उसकी किये

सिंड्रैला थी अकेली, इक परी हाज़िर हुई,,
 सिंड्रैला को सजाया, उसको इक गाड़ी भी दी 

हूर-सी लगने लगीं अब, सिंड्रैला साहिबा,,
 चल पड़ीं दरबार को वो, वाह अब कहना ही क्या ! 

शाहज़ादे ने जो देखा, रक़्स को मदऊ किया,,
 नाचते दोनों रहे, लेकिन यकायक ये हुआ 

"देर मुझको हो गई है" सिंड्रैला को लगा,,
 तेज़ क़दमों से वो भागी, शाहज़ादा था हैरां

भागते में उसकी इक नालैन वां पे रह गई,,
 सिंड्रैला की निशानी शाहज़ादे को मिली 

उसने ये ऐलान करवाया कि "सुन ले हर कोई,,
 जिसकी ये नालैन है, दुल्हन बनेगी बस वही" 

सुन के ये ऐलान, फिर से लड़कियां आने लगीं,,
 पैर में लेकिन किसी के जूती वो आई नहीं 

सिंड्रैला जी की बहनों ने भी की कोशिश बड़ी,,
 पैर में जूती न आई, उन को मायूसी हुई 

आज़मा जब सब चुके तो सिंड्रैला ने कहा,,
 "ये तो मेरी जूती है, लाओ ये मुझको दो ज़रा" 

जैसे ही उसने वो पहनी, जूती उसके आ गई,,
 ये अदा भी उसकी, शह्ज़ादे के दिल को भा गई 

कर ली शादी सिंड्रैला से, बहुत ख़ुश वो हुआ,,
 रह गईं जल-भुन के, जितनी थीं वहां पे लड़कियां 

इस तरह तक़दीर उस मज़लूम की रौशन हुई,,
 बन गई बेगम वो शाही, कल तलक जो कुछ न थी 

सच कहा है ये किसी ने, "जो मुक़द्दर में लिखा,,
 मिल के वो रहता है, दुश्मन लाख ही चाह ले बुरा ।" 
---मुईन शमसी

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

हिन्दी ग़ज़ल : शायरी (सर्वाधिकार सुरक्षित)


अभिव्यक्ति है ये भावनाओं के उफान की
ये शायरी ज़बां है किसी बे-ज़बान की

है कल्पना के संग ये निर्बाध दौड़ती
चर्चा कभी सुनी नहीं इसकी थकान की

उड़ने लगे तो सातवां आकाश नाप दे
सीमा तो देखिये ज़रा इसकी उड़ान की

बनती कभी ये प्रेम व सौन्दर्य की कथा
कहती कभी है दास्तां तीरो-कमान की

मिलती है राष्ट्रभक्ति की चिंगारी को हवा
लेती है जब भी शक्ल ये एक देशगान की

समृद्ध इसने भाषा-ओ-साहित्य को किया
रक्षा भी की है शायरों-कवियों के मान की

’शमसी’ जहां में इसने कई क्रांतियां भी कीं
दुश्मन बनी है क्रूर नरेशों की जान की ।
---मुईन शमसी