शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

ग़ज़ल: "आओ मिलजुल के" (सर्वाधिकार सुरक्षित)

आओ मिलजुल के कोई बात बनाई जाए
आपसी प्रेम की इक रस्म चलाई जाए ।

नफ़रतों का ये शजर अब है बहुत फैल चुका
अब तो उल्फ़त की कोई बेल लगाई जाए ।

दोनों जानिब से ही इस आग ने घी पाया है
दोनों जानिब से ही ये आग बुझाई जाए ।

तलख़ियां भूल के माज़ी की, गले लग जाएं
दूरी बरसों से बनी है जो, मिटाई जाए ।

जाहिलिय्यत के अंधेरों को मिटाने के लिये
हर तरफ़ इल्म की इक शम्मा जलाई जाए ।

जो मदरसे में हैं तलबा, वो पढ़ें संसकिरित
और उर्दू ’शिशु-मंदिर’ में पढ़ाई जाए ।

छोड़ के मंदिर-ओ-मस्जिद के ये झगड़े ’शमसी’
एक हो रहने की सौगंध उठाई जाए ।


( रचयिता: मुईन शमसी )


नोट: बोल्ड अक्षरों में लिखे हुए शब्दों के अर्थ क्रमश: इस प्रकार हैं :
पेड़, प्रेम, ओर, कड़वाहटें, भूतकाल, अज्ञानता, शिक्षा, छात्र, संस्कृत ।



GHAZAL: AAO MILJUL KE (ALL RIGHTS ARE RESERVED.)


AAO MILJUL KE KOI BAAT BANAAI JAAYE
AAPASI PREM KI IK RASM CHALAAI JAAYE.

NAFRATON KA YE SHAJAR AB HAI BAHUT PHAIL CHUKA
AB TO ULFAT KI KOI BEL LAGAAI JAAYE.

DONON JAANIB SE HI ISS AAG NE GHEE PAYA HAI
DONO JAANIB SE HI YE AAG BUJHAAI JAAYE.

TALKHIYAAN BHOOL KE MAAZI KI, GALEY LAG JAAYEN
DOORI BARSON SE BANI HAI JO, MITAAI JAAYE.

JAAHILIYYAT KE ANDHERON KO MITAANE KE LIYE
HAR TARAF ILM KI IK SHAMMA JALAAI JAAYE.

JO MADARSE ME HAIN TALABAA WO PADHEN SANSKIRIT
AUR URDU 'SHISHU-MANDIR' ME PADHAAI JAAYE.

CHHOD KE MANDIR-O-MASJID KE YE JHAGDEY 'SHAMSI'
EK HO REHNE KI SAUGANDH UTHHAAI JAAYE.


(POET: MOIN SHAMSI)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें