मंगलवार, 12 जुलाई 2011

ग़ज़ल वस्ल की ख़्वाहिश (All rights reserved)

बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है
इक आग दो दिलों के, अंदर भड़क रही है

मस्ती भरी हवा है, मख़मूर सी फ़ज़ा है
धरती की सोंधी ख़ुशबू, हर-सू महक रही है

वो दिलरुबा जो अरसा, ओढ़े रही ख़मोशी
चिड़िया-सी आज देखो, कैसी चहक रही है

दिल मेरा कह रहा है, कुछ आज हो रहेगा
ये आंख है कि कब से, रह-रह फड़क रही है

तू मेरे सामने है, मैं तेरे सामने हूं
दोनों की आज धड़कन, सुर में धड़क रही है

तारीक रात भी है, और तेरा साथ भी है
मैं भी बहक रहा हूं, तू भी बहक रही है

अब वस्ल की है ख़्वाहिश, चेहरे से ये अयां है
सूरत हसीन उनकी, ’शमसी’ दमक रही है ।

---मुईन शमसी

अल्फ़ाज़-ओ-मानी:
वस्ल = मिलन, ख़्वाहिश = इच्छा, मख़मूर = नशीली, फ़ज़ा = वातावरण, अरसा = लम्बे समय तक, ख़मोशी = ख़ामोशी, तारीक = अंधेरी, अयां = स्पष्ट

BAADAL GARAJ RAHE HAIN, BIJLI KADAK RAHI HAI
IK AAG DO DILON KE, ANDAR BHADAK RAHI HAI

MASTI BHARI HAWA HAI, MAKHMOOR SI FAZAA HAI
DHARTI KI SONDHI KHUSHBU, HAR-SOO MAHAK RAHI HAI

WO DILRUBA JO ARSAA, ODHEY RAHI KHAMOSHI
CHIDIYAA-SI AAJ DEKHO, KAISI CHAHAK RAHI HAI

DIL MERA KEH RAHA HAI, KUCHH AAJ HO RAHEGAA
YE AANKH HAI KE KAB SE, REH-REH PHADAK RAHI HAI

TU MERE SAAMNE HAI, MAIN TERE SAAMNE HU
DONO KI AAJ DHADKAN, SUR ME DHADAK RAHI HAI

TAAREEK RAAT BHI HAI, AUR TERA SAATH BHI HAI
MAIN BHI BAHAK RAHA HU, TU BHI BAHAK RAHI HAI

AB WASL KI HAI KHWAAHISH, CHEHRE SE YE AYAAN HAI
SOORAT HASEEN UNKI, 'SHAMSI' DAMAK RAHI HAI.

---MOIN SHAMSI

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें