रविवार, 5 दिसंबर 2010

ghazal : TUM

आफ़ताब-ए-सुबह हो तुम, माहताब-ए-शाम हो,
हो जहां तुम वाँ अंधेरों का भला क्या काम हो।

है तुम्हारे दम से महफ़िल में चराग़ाँ हर तरफ़,
तुम न हो तो सूनी-सूनी सी यहां हर शाम हो ।

तुम रहो जिसके मुक़ाबिल, होश उसके गुम रहें,
क्यूं करे वो आरज़ू हाथों में उसके जाम हो !

हूँ मरीज़-ए-इश्क़ मैं और मर्ज़ मेरा ला-इलाज,
तुम अगर छू दो तो शायद मुझको कुछ आराम हो ।

हैं तुम्हारी दीद के लाखों दिवाने मुन्तज़िर,
इक अकेला नाम मेरा क्यूं भला बदनाम हो !

बज़्म-ए-दिल की पुर-अलम तारीकियों के वास्ते,
ऐ मेरे हमदर्द तुम तो नूर का पैग़ाम हो ।

कर दिया इज़हार लो ’शमसी’ ने अपने इश्क़ का,
कुछ नहीं मालूम इसको, इसका क्या अंजाम हो ।

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