सोमवार, 20 दिसंबर 2010

ghazal: MUHABBAT-MUHABBAT

तुम्हारी मुहब्बत हमारी मुहब्बत
जहाँ में सभी की है प्यारी मुहब्बत ।

मुसीबत के कितने पहाड़ इस पे टूटे
न ज़ुल्म-ओ-सितम से है हारी मुहब्बत ।

इसे रोकने को कई आए लेकिन
है आब-ए-रवाँ जैसी जारी मुहब्बत ।

इक आशिक़ ने इक रोज़ हम से कहा था
"ख़ुदा की है ये दस्तकारी मुहब्बत" ।

है जिस दिन से देखा वो नूरानी पैकर
नशे जैसी दिल पे है तारी मुहब्बत ।

पुरुष भूल जाता है अक्सर, परन्तू
नहीं भूल पाती है नारी मुहब्बत ।

उसे बे-ज़बानों का खूँ है बहाना
करेगा भला क्या शिकारी मुहब्बत ।

हैं सब तुझ पे शैदा, है क्या ख़ास तुझ में
ज़रा मुझ को ये तो बता री मुहब्बत !

कभी दिल में ’शमसी’ के आ के तो देखो
है इस में भरी ढेर सारी मुहब्बत ।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

ghazal : TUM

आफ़ताब-ए-सुबह हो तुम, माहताब-ए-शाम हो,
हो जहां तुम वाँ अंधेरों का भला क्या काम हो।

है तुम्हारे दम से महफ़िल में चराग़ाँ हर तरफ़,
तुम न हो तो सूनी-सूनी सी यहां हर शाम हो ।

तुम रहो जिसके मुक़ाबिल, होश उसके गुम रहें,
क्यूं करे वो आरज़ू हाथों में उसके जाम हो !

हूँ मरीज़-ए-इश्क़ मैं और मर्ज़ मेरा ला-इलाज,
तुम अगर छू दो तो शायद मुझको कुछ आराम हो ।

हैं तुम्हारी दीद के लाखों दिवाने मुन्तज़िर,
इक अकेला नाम मेरा क्यूं भला बदनाम हो !

बज़्म-ए-दिल की पुर-अलम तारीकियों के वास्ते,
ऐ मेरे हमदर्द तुम तो नूर का पैग़ाम हो ।

कर दिया इज़हार लो ’शमसी’ ने अपने इश्क़ का,
कुछ नहीं मालूम इसको, इसका क्या अंजाम हो ।

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

ghazal : makhmali ahsaas

किसी का मख़मली अहसास मुझको गुदगुदाता है
ख़यालों में दुपट्टा रेशमी इक सरसराता है

ठिठुरती सर्द रातों में मेरे कानों को छूकर जब
हवा करती है सरगोशी बदन यह कांप जाता है

उसे देखा नहीं यों तो हक़ीक़त में कभी मैंने
मगर ख़्वाबों में आकर वो मुझे अकसर सताता है

नहीं उसकी कभी मैंने सुनी आवाज़ क्योंकि वो
लबों से कुछ नहीं कहता इशारे से बुलाता है

हज़ारों शम्स हो उठते हैं रौशन उस लम्हे जब वो
हसीं रुख़ पर गिरी ज़ुल्फ़ों को झटके से हटाता है

किसी गुज़रे ज़माने में धड़कना इसकी फ़ितरत थी
पर अब तो इश्क़ के नग़मे मेरा दिल गुनगुनाता है

कहा तू मान ऐ ’शम्सी’ दवा कुछ होश की कर ले
ख़याली दिलरुबा से इस क़दर क्यों दिल लगाता है !

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

DASHAHRA GHAZAL

इस बार दशहरे पे नया काम हम करें,
रावण को अपने मन के चलो राम हम करें ।

दूजे के घर में फेंक के पत्थर, लगा के आग,
मज़हब को अपने-अपने न बदनाम हम करें ।

उसका धरम अलग सही, इन्सान वो भी है,
तकलीफ़ में है वो तो क्यूं आराम हम करें ।

माज़ी की तल्ख़ याद को दिल से निकाल कर,
मिलजुल के सब रहें, ये इन्तिज़ाम हम करें ।

अपने किसी अमल से किसी का न दिल दुखे,
जज़बात का सभी के अहतराम हम करें ।

अब मुल्क में कहीं भी न दंगा-फ़साद हो,
बस प्यार-मुहब्बत की रविश आम हम करें ।

’शम्सी’ मिटा के अपने दिलों से कदूरतें,
शफ़्फ़ाफ़ ख़यालों का अहतमाम हम करें ।

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

kyu hai !!!

सबके होते हुए वीरान मेरा घर क्यूं है,
इक ख़मोशी भरी गुफ़्तार यहां पर क्यूं है !

एक से एक है बढ़कर यहां फ़ातेह मौजूद,
तू समझता भला ख़ुद ही को सिकन्दर क्यूं है !

वो तेरे दिल में भी रहता है मेरे दिल में भी,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दर क्यूं है !

सब के होटों पे मुहब्बत के तराने हैं रवाँ,
पर नज़र आ रहा हर हाथ में ख़न्जर क्यूं है !

क्यूं हर इक चेहरे पे है कर्ब की ख़ामोश लकीर,
आंसुओं का यहां आंखों में समन्दर क्यूं है !

तू तो हिन्दू है मैं मुस्लिम हूं ज़रा ये तो बता,
रहता अक्सर तेरे कांधे पे मेरा सर क्यूं है !

काम इसका है अंधेरे में दिया दिखलाना,
राह भटका रहा ’शम्सी’ को ये रहबर क्यों है !

बुधवार, 29 सितंबर 2010

Ghazal : Ghamon ki dhoop

ग़मों की धूप से तू उम्र भर रहे महफ़ूज़,

ख़ुशी की छाँव हमेशा तुझे नसीब रहे ।


रहे जहाँ भी तू ऐ दोस्त ये दुआ है मेरी,

मसर्रतों का ख़ज़ाना तेरे क़रीब रहे।


तू कामयाब हो हर इम्तिहाँ में जीवन के,

तेरे कमाल का क़ायल तेरा रक़ीब रहे ।


तू राह-ए-हक़ पे हो ता-उम्र इब्न-ए-मरियम सा,

बला से तेरी कोई मुन्तज़र सलीब रहे ।


नहीं हो एक भी दुश्मन तेरा ज़माने में,

मिले जो तुझसे वो बन के तेरा हबीब रहे ।


न होगा ग़म मुझे मरने का फिर कोई ’शम्सी’,

जो मेरे सामने तुझ-सा कोई तबीब रहे ।

---MOIN SHAMSI

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

बाल-कविता

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई,
आपस में सब भाई-भाई ।


बहकावे में आ जाते हैं,
हम में है बस यही बुराई ।


अब नहीं बहकेंगे हम भईया,
हम ने है ये क़सम उठाई ।


मिलजुल कर हम सदा रहेंगे,
हमें नहीं करनी है लड़ाई ।


देश करेगा ख़ूब तरक़्क़ी,
हर घर से आवाज़ ये आई ।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

तुम चले क्यों गए ?

तुम चले क्यों गये

मुझको रस्ता दिखा के, मेरी मन्ज़िल बता के तुम चले क्यों गये

तुमने जीने का अन्दाज़ मुझको दिया

ज़िन्दगी का नया साज़ मुझको दिया

मैं तो मायूस ही हो गया था, मगर

इक भरोसा-ए-परवाज़ मुझको दिया।

फिर कहो तो भला

मेरी क्या थी ख़ता

मेरे दिल में समा के, मुझे अपना बना के ,तुम चले क्यों गये

साथ तुम थे तो इक हौसला था जवाँ

जोश रग-रग में लेता था अंगड़ाइयाँ

मन उमंगों से लबरेज़ था उन दिनों

मिट चुका था मेरे ग़म का नामो-निशाँ।

फिर ये कैसा सितम

क्यों हुए बेरहम

दर्द दिल में उठा के, मुझे ऐसे रुला के तुम चले क्यों गये

तुम चले क्यों गये

तुम चले क्यों गये?

शब्दार्थ: परवाज़ = उड़ान रग-रग = नस-नस लबरेज़ = भरा हुआ

रविवार, 26 सितंबर 2010

"वर्ल्ड हार्ट डे" के अवसर पर

कोई भी बात दिल से न अपने लगाइये,
अब तो ख़ुद अपने दिल से भी कुछ दिल लगाइये ।


दिल के मुआमले न कभी दिल पे लीजिये,
दिल टूट भी गया है तो फिर दिल लगाइये ।


दिल जल रहा हो गर तो जलन दूर कीजिये,
दिलबर नया तलाशिये और दिल लगाइये ।


तस्कीन-ए-दिल की चाह में मिलता है दर्द-ए-दिल,
दिलफेंक दिलरुबा से नहीं दिल लगाइये ।


दिल हारने की बात तो दिल को दुखाएगी,
दिल जीतने की सोच के ही दिल लगाइये ।


बे-दिल, न मुर्दा-दिल, न ही संगदिल, न तंगदिल,
बुज़दिल नहीं हैं आप तो फिर दिल लगाइये ।


’शम्सी’ के जैसा ना कोई दिलदार जब मिले,
क्या ख़ाक दिल चुराइये, क्या दिल लगाइये !

बुधवार, 22 सितंबर 2010

दिवस वही फिर आए

(ये रचना "एक प्रतिभागी की व्यथा-कथा" का अगला भाग है)

दिवस वही फिर आए ।
फिर से वहीं पे जमा हुए हम,
फिर बैठे गर्दन को झुकाए ।
दिवस वही फिर आए ।


शुतुरमुर्ग सी ऊँची गर्दन करके सबकी सुनते,
वक्ता कभी बनेंगे हम भी, ऐसे सपने बुनते,
संवादों की भीड़ से अपनी ख़ातिर शब्द हैं चुनते,
हर पल हैं ऐलर्ट जाने कब ’क्यू’ देना पड़ जाए !
क्योंकि दिवस वही फिर आए ।


फिर से मिले हैं पैन, पैड और फिर से बढ़िया खाना,
फिर से सुबह जल्दी आना है देर रात है जाना,
फिर से वही घोड़े की भाँति मुन्डी को है हिलाना,
सब कुछ मिला है किन्तु पुनः डायलाग्स नहीं मिल पाए ।
भईया दिवस वही फिर आए ।


वक्ता को फर्रे दिखलाते, पैड पे यों ही पैन फिराते,
कन्टीन्युटी के लिये ग्लास में बार-बार पानी भरवाते,
मेज़ पे टहल रही मक्खी को फूंक मार कर दूर भगाते,
डायरेक्टर ने ’सुधीजनों’ को यही काम बतलाए ।
मैडम दिवस वही फिर आए ।


विनती करते हैं ये रब से, अगले वर्ष ये शूटिंग फिर हो,
यही ओखली मिले हमें फिर, फिर से इसमें अपना सिर हो,
ख़ास तौर से लिखी हुई स्क्रिप्ट ’हमारी’ ख़ातिर हो,
वक्ता का पद मिले अपुन को, अपुन ख़ूब इतराए ।
रब्बा दिवस वही फिर आए ।
यारो दिवस वही फिर आए ।
लोगो दिवस वही फिर आए ।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

MAAH-E-SIYAAM ME

HAR SHAY JUDAA-JUDAA LAGEY MAAHE SIYAAM ME,

PAANI ME BHI MAZAA LAGEY MAAHE SIYAAM ME.


BANDAA HO TANDURUST MAGAR ROZA NA RAKHEY,

ALLAH KO YE BURA LAGEY MAAHE SIYAAM ME.


HO DHOOP CHAANDNI YA SAMANDAR HAWAA SHAJAR,

SAB KUCHH NAYA-NAYA LAGEY MAAHE SIYAAM ME.


QAABU HAI KITNA NAFS PE HAR ROZEDAAR KO,

DUNIYA KO YE PATAA LAGEY MAAHE SIYAAM ME.


MASJID NAMAAZIYON SE HAI ‘SHAMSI’ BHARI HUI,

MANZAR YE KHUSHNUMA LAGEY MAAHE SIYAAM ME।



(इसे सुनना चाहें तो यहाँ तशरीफ लायें : http://www.esnips.com/web/moinshamsi )




गुरुवार, 19 अगस्त 2010

RAMZAAN AA GAYAA

RAMZAAN AA GAYAA SUNO RAMZAAN AA GAYAA,

BAARAH MAHEENO KA HAI YE SULTAAN AA GAYAA.


HAR SHAKHS TILAAWAT-O-TARAAWEEH ME HAI MASROOF,

ALLAH KE GHAR HAR EK MUSALMAAN AA GAYAA.


BEHKA SAKEGA NA KISI MOMIN KO IN DINO,

AB EK MAAH KI QAID ME SHAITAAN AA GAYAA.


AHKAAM-E-ILAAHI SABHI DUNIYA KO SUNAANE,

IS MAAHE MUQADDAS ME YE QUR-AAN AA GAYAA.


HAASIL KARO DARJE, KARO KASRAT SE IBAADAT,

HAR GHAR ME YE ALLAH KA FARMAAN AA GAYAA.


JAB TAK RAHEGA GHAR MERE BARKAT BADHAAYEGA,

MAAHE SIYAAM BAN KE WO MEHMAAN AA GAYAA.


GHAAFIL THA JO EEMAAN SE, MUDDAT SE WO DEKHO,

AAJ HAQ KI RAAH ‘SHAMSI’-E-NAADAAN AA GAYAA.

(TO LISTEN IT, VISIT: http://www.esnips.com/web/moinshamsi )